कहते हैं मोहब्बत दुनिया की सबसे पाक़ चीज़ है। जिसे अपना करना हो पहले उसका होना पड़ता है, उसे आज़ाद करके। क्योंकि मोहब्बत अपनी मर्ज़ी से खुले पिंजरे में कैद होने का नाम है। मोहब्बत दूर नहीं जाने देती लेकिन पर भी नहीं कतरती, परवाज़ नहीं रोकती। यह धीमे-धीमे फ़ासला ख़तम करती है। मोहब्बत हमें बेहतर इंसान बनाती है। सही और गलत में फ़र्क करना सिखाती है। मोहब्बत ही हमें बताती है कि मोहब्बत में पाना सब कुछ नहीं होता। मोहब्बत में सिर्फ़ यह मायने रखता है कि कोई तुमसे सच्ची मोहब्बत करता हो।
मोहब्बत अंधी नहीं होती। यह फ़राख-दिल होती है। ऐब देखती है मगर नज़रंदाज़ कर
देती है। क्या हमें किसी से सिर्फ़ तब ही मोहब्बत हो सकती है जब वो हमारे लिए कुछ
करे? क्या मोहब्बत इतनी ख़ुदगर्ज़ होती है? मैं नहीं मानता
दिल के साथ ज़िद नहीं करते चुपचाप दिल की मान लेते हैं। अगर दिल को जीतता हुआ देखना चाहते हो तो दिल को हारकर देखो। लेकिन मन अगर फिर भी परेशान हो तो अपने दिल की मानकर अक्ल की ऊँगली थाम लो और जितने भी ज़हनी सवाल हों उनके जवाब खुद ढूँढ लो। सच्ची मोहब्बत हर आजमाइश की गुंजाइश रखती है। लेकिन फिर मोहब्बत भी टूटकर करनी होगी।
मोहब्बत के बदले इंसान सिर्फ मोहब्बत चाहता है। उसे और कुछ नहीं पसंद आता। मोहब्बत में इन्सान दिल में जगह चाहता है सिर्फ़ ज़िन्दगी में नहीं। किसी के दिल में जगह होने में और उसकी ज़िन्दगी में जगह होने में फ़र्क होता है उतना ही जितना जीने और ज़िन्दा रहने में।
- हिमांशु जायसवाल

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