Follow Us @himanshujaiswal2711

शनिवार, फ़रवरी 15, 2020

दूर बहुत दूर




मैं रोज अपने कमरे से दो किलोमीटर पैदल चलकर ऑफिस जाता हूँ। रास्ते में अक्सर अपनी नौकरी के बारे में सोचता हूँ। फिर उससे ध्यान हटाने के लिए कुछ और सोचने लगता हूँ। ध्यान भटकाना अच्छा लगता है। यही कि मुझे कहानियों के अंत पसंद नहीं आते। अच्छा अंत, बुरा अंत, कोई सा भी अंत। अंत सम्भावनाओं का गला घोंट देता है। सम्भावनायें जो घटी नहीं होतीं। सम्भावनायें जिन्हें सोचा भी नहीं गया है।

चलते चलते मैं यही सब अपने मोबाइल के नोट्स में टाइप कर रहा हूँ। मुझे एक दम सीधे चलते जाना पसंद है। लेकिन मैं पीछे मुड़ मुड़ कर देखता रहता हूँ। कुछ पीछे तो नहीं छूट गया। 

मैं कभी किसी को पीछे छोड़ ही नहीं पाया। अलविदा कह देना किसे कहते हैं? जो वादे हमने कभी किये होते हैं उनसे कैसे कहे कि तुम कभी थे ही नहीं? कैसे किसी को भूला जाता है? 

मुझे सहेजना पसंद है। मुझे अंत पसंद नहीं। मेरे बटुए में मिल जाएंगी नब्बे के दशक की भी चीजें। 5-6 साल पुराना कोई बस का टिकट, 'मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूंगा' और 'मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता' लिखी सिमटी हुयी पर्चियां। 

मैं अभी भी चल रहा हूँ। अभी सोच रहा हूँ कि ऑफिस इतनी दूर कैसे रह गया। हमेशा तो जल्दी आ जाता है। जल्दी से ऑफिस आ जाए तो वहाँ बैठकर कुछ और सोचने लगूँ। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है...