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मंगलवार, अक्टूबर 10, 2017

अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस

अक्टूबर 10, 2017 0 Comments


सुनो लड़कियों,

बहुत खुशनसीब हो तुम जो तुम्हे समाज की नींव कहा जाता है बुद्धिजीवियों के यहाँ। क्योंकि तुम हो। तुम नहीं तो ना ये समाज है, ना हम हैं ना कुछ और। हाँ, अब मुझे लेखक की जगह फेमिनिस्ट लेखक लोग जरूर कहने लगेंगे इसलिए बहुत बदनसीब भी हो जो कइयों जगह तुम्हे कमजोर समझा जाता रहा है। तुम्हारे लिए सहारे ढूंढें जाते रहे हैं। कॉलेज पढ़ना है तो पास का होना चाहिए, अकेले ज्यादा दूर तक नहीं जा सकती, पल-पल खबर देनी पड़ती है।  भाइयों के प्यार की जगह उनकी हर पल की चिंता से भी परेशान सी हो जाती होंगी। मम्मी-पापा रूठते होंगे तो इसलिए नहीं कि तुम अपना ख्याल नहीं रखती या तुम मजबूत नहीं बन रही बल्कि इसलिए कि उनके द्वारा दी गयी हिदायतें या तो मानी नहीं या फिर सुनी ही नहीं। अरे वो तुम्हारे लिए उनका प्यार ही तो है।

लेकिन तुम सब से एक शिकायत है मेरी। इन सब बातों को तुम लोगों ने खुद अपने पैरों की जंजीर मान लिया है। सही भी है, संस्कार। यही कुछ नाम दिया गया है ना इन सब को। तुम अपने मन का ना पढके वो विषय पढ़ती हो जो आसपास होते हैं। तुम खुद अकेले वही तक जाती हो जहाँ संस्कार तुम्हे इज़ाज़त देते हैं। इतने बड़े और सभ्य समाज में तुम्हारा नाम सिर्फ इसलिए लिया जाता है कि तुम so called संस्कारी हो।

फिर हम लड़को को क्यों नहीं सिखाये जाते ये संस्कार। क्यों हमें इतनी छूट दी जाती है। क्यों हमें नहीं रोका जाता दुनिया घूमने से, दुनिया Explore करने से, अपने पसंद के विषय चुनने से, अपनी पसंद की नौकरी करने से, अपनी पसंद का हर वो काम करने से जो या तो हमें ख़ुशी देते है या हमें आगे बढ़ाते है। क्यों नहीं रोका जाता हमें इस सभ्य समाज में प्यार करने से। क्यों हमारे घर में वही संस्कार हमें नहीं दिए जाते जो लड़कियों को। क्यों उनके संस्कारों का हमें ज्ञान नहीं होता। अगर हमें भी सिखाया जाये मर्यादा में रहना तो कितना अच्छा हो।

हम सब बुरे नहीं है हाँ पर जो हैं वो इसलिए क्योंकि उन्हें तुम्हारे संस्कारों की समझ नहीं है। और उन नासमझों की समझ डाली जाती है तुम्हारे अंदर इन्ही संस्कारों के नाम से।

पर याद रखना ये संस्कार जरूरी है लेकिन वहीँ तक जहाँ तुम्हे तुम्हारी पसंद की बुनियादी चीज़े करने की आज़ादी हो। तुम्हे तुम्हारे पसंद के विषय पढ़ने की आज़ादी हो, पसंद के कॉलेज में जाने की आज़ादी हो, खुद की पसंद की नौकरी करने की आज़ादी हो, खुद को बेहतर इंसान बनाने के लिए जो भी करना होता है वो करने की आज़ादी हो, खुद की खुशियाँ तलाशने की आज़ादी हो। सिर्फ आज़ादी नहीं, प्रोत्साहन भी हो। लेकिन ये तब तक नहीं होगा जब तक तुम लड़कियाँ नहीं चाहोगी। जब तक हम लड़कें इस आज़ादी को नहीं समझेंगे। जब तक माँ-बाप-भाई मदद नहीं करेंगे। और वो मदद हिम्मत करके तुम्हे मांगनी होगी। समझाना होगा, लड़ना होगा। यही है तुम्हारी खुद से लड़ाई। और इसमें किसी का बुरा नहीं है, किसी का विश्वास नहीं टूट रहा इसमें, किसी गलत काम को नहीं कर रही तुम। क्योंकि तुमसे जुड़े लोगों की ख़ुशी तुम्हारी ख़ुशी से है, तुम्हारी ख़ुशी के तुम्हारे ही अंदर घुटने से नहीं। और जो अपने इस बात को नहीं समझते हमें उन्हें बैठकर प्यार से समझाना होता है।

चलो तैयार हो जाओ। खुद से खुद की लड़ाई इतनी आसान नही होती। लेकिन जब ये पूरी  हो जाएगी तो किसी का कुछ बुरा नहीं होगा क्योंकि तुम्हारे जीतने से कोई हारेगा नहीं इसमें। लेकिन तुम्हारे हारने से सब हार जायेंगे। समाज हार जायेगा, मैं हार जाऊँगा। जब तुम्हे नींव कहा गया है तो मज़बूत बनो। क्योंकि मैं साथ हूँ तुम्हारे, मेरे जैसे कई और साथ हैं। खुद को और अपने सपनो को समझने का काम तुम्हारा ही है। तुम्हे तुमसे बेहतर कोई नहीं जान सकता।

तुम्हारा पागल दोस्त
हिमाँशु मोहन


शुक्रवार, अक्टूबर 06, 2017

रूह से रूह तक ( विनीत बंसल ) – समीक्षा

अक्टूबर 06, 2017 2 Comments


कहानियाँ कई तरह की होती हैं लेकिन आज के समय में जो युवाओं के द्वारा सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं वो है या तो प्रेम या फिर कॉलेज लाइफ पर आधारित कोई कहानी I रूह से रूह तक उपन्यास की कहानी भी इससे कुछ जुदा नहीं है I इसी लीक पर लिखी गयी एक सस्पेंस से भरी कहानी है I उपन्यास का नाम उसकी कहानी को तो नहीं पर कहानी में दर्शाए गए प्रेम को पूरी तरह से व्यक्त करता है I लेखक के शब्दों में कहूँ तो – “प्यार वो जज्बा है जो दिल को दिल से नहीं बल्कि रूह को रूह से जोड़ता है I”

हिंदी साहित्य की दृष्टि से उपन्यास में झाँकने के लिए कुछ खास है नहीं लेकिन जिन्हें कोई जासूसी उपन्यास या फिर कॉलेज रोमांस पर कुछ अच्छा पढ़ने का मन हो तो वो इस किताब को आंख बंद कर खरीद सकते हैं I अंग्रेजी उपन्यास पढने वाले युवा अगर कोई हिंदी उपन्यास पढने का सोंच रहे हैं तो वे किसी हिंदी रूपांतरण के बजाय अगर “रूह से रूह तक” को पढ़ेंगे तो उन्हें इसमें वही रोमांस, रोमांच, सस्पेंस और मसाला मिल जायेगा जो वो अक्सर अंग्रेजी के उपन्यासों में देखते हैं I

नील गुप्ता जिसका जयपुर यूनिवर्सिटी में पहला दिन है रणदीप को दूसरे गैंग के लड़कों से बचाता है I लेकिन ना किसी गैंग को अच्छे से दिखाया गया है और ना ही मारपीट का कोई कारण समझ में आता है I इसे कहानी की सबसे कमजोर कड़ी ही कहूँगा I फिर वही किसी फिल्म की कहानी की तरह कहानी आगे बढती है I नील और रणदीप में बड़ी गहरी दोस्ती हो जाती है, सगे भाई से भी बढकर और धीरे धीरे रणदीप के साथ से उसे यूनिवर्सिटी में सभी जानने लगते है I

कहानी जयपुर यूनिवर्सिटी से शुरू होती है..हालाँकि ये किसी यूनिवर्सिटी की फील दे नहीं पाती I कहानी में राजनीति को दिखाने का असफल प्रयास किया गया है जहाँ दबंगई तो है लेकिन दबंगई करने वालों के दिल अच्छे हैं I इससे लेखक के साफ दिल का पता चलता है I कहानी का दबंग रणदीप शुरू शुरू में मिलनसार, एक अच्छा दोस्त और भाई दिखाया जाता है जो आखिर तक आते आते नील गुप्ता का जानी दुश्मन बन जाता है I यह कैसे और किन हालातों में होता है कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा यही है I

इसी बीच एक खूबसूरत लड़की अदिति जिसकी कॉलेज में लेट एंट्री हुई है वो नील की पहली नजर की मोहब्बत बन जाती है I वहीँ रिया भी लेट एंट्री में एडमिशन लेती है I यू.एस. से आने के बाद वो जयपुर यूनिवर्सिटी में एडमिशन क्यों ले लेती है ये बात समझ से परे है लेकिन वो एक फैशन शो से पूरे कॉलेज की स्टार बन जाती है I ये वाकया ऐसा लगता है जैसे हम खुद उस कॉलेज में बैठे उस शो का हिस्सा हों जिसे लेखक ने बखूबी पेश किया है I

नील-अदिति के प्यार को, उनके रिश्ते को जिस बारीकी से विनीत जी ने दिखाया है वो काबिले तारीफ है I वे सही मायनों में कहानी के आगे बढ़ने के साथ साथ सच्चे प्यार की नींव रखते चलते हैं जिसमें सपने हैं, वादे हैं, रूमानियत है, विश्वास है और समर्पण भी शारीरिक और मानसिक दोनों I बीच बीच में लगता है कि कहानी का कोई उद्देश्य नहीं लेकिन जैसे ही रिया के इश्क के रूप में रणदीप को जो बुखार चढ़ता है उससे कहानी की दिशा पूरी तरह से बदल जाती है I रिया रणदीप के प्यार को ठुकरा देती है और रणदीप की हालत एक देवदास की तरह हो जाती है I नील से उसकी ये हालत देखी नहीं जाती इसी बीच कुछ ऐसा होता है कि रिया हॉस्टल की छत से कूदकर आत्महत्या कर लेती है और उसका इलज़ाम नील पर लगा जाती है I इसी बदली हुयी हवा से नील की जिंदगी एक रिवर्स गियर पर चली जाती है जो उसके साथ-साथ अदिति की जिंदगी भी बदल कर रख देती है I वास्तव में कहानी का जासूसी टाइप अध्याय यही से शुरू होता है जो पूरी तरह सस्पेंस से भरा हुआ है I पढ़ते समय आगे क्या होगा...? अब क्या होगा ? जैसे सवालों से पाठक किताब से चिपके रहने को मजबूर हो जाता है I

लेखन शैली में कुछ खास नया देखने को नहीं मिलता I वही पुरानी सुन्दरता की उपमाएं...वैसा ही कॉलेज रोमांस जिसे पढ़कर पाठक फिर से आनंद के कुछ पल महसूस कर सकता है I कहानी का फ़िल्मी होना पाठक को बेहद पसंद आ सकता है I एकतरफ़ा और सिर्फ बाहरी खूबसूरती को देखकर प्यार हो जाना असल प्यार नहीं होता, ये बताना उपन्यास का मुख्य उद्देश्य है I प्यार एक रूह से रूह का संगम है I जो तब भी साथ रहता है जब पूरी दुनिया भी खिलाफ हो जाती है I किसी के दिल में झांके बिना सिर्फ उसकी खूबसूरती देखकर उसके प्यार की बानगी पढ़ना खतरनाक हो सकता है तो वही सच्चा प्यार इतना ओछा नहीं होता कि ठुकराए जाने पर व्यक्ति का चरित्र निम्न स्तर पर खिसक जाये I विनीत बंसल का यह उपन्यास इन्ही प्रतिमानों को स्थापित करता चलता है I

तो वास्तव में “रूह से रूह तक” में सभी के लिए कुछ न कुछ है I ये किताब निराश नहीं करती I अगर आप लेखक की छोटी मोती तकनीकी गलतियों को नज़रंदाज़ कर सकते हैं तो वास्तव में इस किताब में पढ़ने के लिए बहुत कुछ है I अच्छी और सरल भाषा शैली जो कि बिलकुल साधारण होकर कहानी को एक ऊंचाई प्रदान करती है I अंत में कहानी पाठक को चौंका सकती है और यही इसकी खासियत भी है I कभी कभी लेखक केवल मनोरंजन की दृष्टि से लिखता है और ऐसे में बहुत कुछ सिखा जाता है I ये किताब भी इसी उद्देश्य को पूरा करती हुई प्रतीत होती है I

(विचार व्यक्तिगत हैं...)

-    हिमाँशु मोहन 


बुधवार, अक्टूबर 04, 2017

डिअर कॉलेज फ्रेंड्स

अक्टूबर 04, 2017 2 Comments
To all my batchmates,

जब कॉलेज में था तो कभी इतना सा खयाल नहीं आया कि जी भर के इन दिनों को जी ले फिर कभी ये दिन वापस नहीं मिलेंगे I सुना तो था अपने सीनियरर्स से कि बेटा...कॉलेज से जाने के बाद बहोत याद करोगे इसलिए जी लो जितना जीना है, फिर कभी ये दिन नहीं आयेंगे I आज जब कॉलेज से कोसों दूर हैं...वहाँ मिलने वाले अलग अलग राज्यों के दोस्तों से कोसों दूर हैं तब सच कहूँ तो उन दिनों को फिर से याद करके दिल रो पड़ता है I वैसे मस्ती तो बहोत की है हम सबने I एक तो हमारी ब्रांच सबसे नयी थी I हमारा पहला बैच था और ऊपर चौदह विद्यार्थियों के ग्रुप में सिर्फ एक लड़की I पूरे कॉलेज की लड़कियों को देखते थे और फिर भौतिकी के गूढ़ सिद्धांतों में खुद को खोकर हर दिन सत्यनारायण की कथा पढ़ कर मन को एकाग्र कर लेते थे I फिर ग्रुप में बैठकर हमने पूरे कॉलेज प्रशासन को इतना कोसा है जितना तो विपक्ष के नेता रूलिंग पार्टी को भी नहीं कोसते I हर क्लास के लेक्चर के बाद माथा पकड़ के बैठना तो रोज का नियम था – “साले को कछु पढाना नहीं आता...जिंदगी में कछु कर नाहीं पाए तो बन गए भौतिकी के प्रोफेसर... और अगर मेरिट में टॉप भी कर लिए और बन गए प्रोफेसर तो कौन सा तीर मार दिए बे... पढ़ाना तो सीख लेते... तो आज हम जैसे नौज़वानों का पढाई और इंजीनियरिंग पर से विश्वास तो ना उठता I”

कहने को तो हम प्रायोगिक भौतिकी अर्थात एप्लाइड/एक्सपेरिमेंटल फिजिक्स में इंजीनियरिंग कर रहे थे पर ये सच तो हमारी अंतरात्मा ही जानती है कि इंजीनियरिंग प्रायोगिक भौतिकी में की या फिर प्रायोगिक डिप्रेशन में I हर दम यही सोंचते थे कि इस नए कोर्स में हमारा भविष्य क्या होगा I शुरू के दो साल तो इसी में निकाल दिए और फिर जब तीसरे साल में आये तब सबको धीरे धीरे अपने ड्रीम्स समझ में आने लगे I कोई यहाँ से निकलने के बाद M.B.A करना चाहता था तो कोई फिजिक्स के बाद मैथमेटिक्स पढने की चाह रखता था...किसी को हवाई जहाज बनाने में दिलचस्पी थी तो किसी को सुदूर विदेश में आगे पढ़ना था और रिसर्च करनी थी I हम में से कुछ नौकरी करने वाले भी थे जिन्हें अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए नौकरी करना एक पेशे से ज्यादा एक जरूरत था I सपने तो उनके पास भी थे लेकिन उनके शायद शब्द नहीं थे I हम दोस्त थे तो जान लेते थे एक दूसरे के मन की बात और जानते भी क्यों ना अक्ल की घंटी सब चेता देती है कि करना क्या था और कर क्या रहे थे I

सबसे ज्यादा यही बात तो याद आती है कि कैसे हम बेख़ौफ़ अपने मन की सारी बातें एक दूसरे से बेझिझक कह लिया करते थे I जब भी अपने कमरे में मन नहीं लगता था पहुँच जाते थे दूसरों के कमरे में I फिर कोई और हमें साथ में बैठे देखता था तो फिर वो भी आ बैठता था I ऐसे धीरे धीरे हम सब किसी डिस्कशन और हंसी के गुलदस्तों के बीच पूरी पूरी रात गुज़र देते थे और एक रात यूँही गुज़र जाती थी बिना ये जताए कि हमने क्या पाया है I आज यही तो जता रही हैं ये राते कि हमने क्या क्या पाया था उन रातों में I सच में बहुत याद आते हैं वो पल, वो साथ, वो रात, वो सितारे और वो मस्त होकर अंधेरों में घूमना, एक दूसरे से लड़ना झगड़ना I बेमतलब की खिंचाई, नाराज़गी और भी बहुत कुछ I जब कभी परेशानियों में अकेले में रोना आता था तब कंधे मिल जाते थे I जब जेब कभी तंग हो जाती थी तो हाथ बढ़ जाते थे I जब लगता था कि पूरी दुनिया में हमारे लिए कोई नहीं है तो सब साथ हो लेते थे I तब खाना खाना कभी एक बोझ और अकेलापन नहीं लाता था I तब वो एक बहाना हुआ करता था थोड़ी और मस्ती करने का I आज चुप से बैठकर वही खाना खा तो लेता हूँ पर जैसे लगता है स्वाद तो वहीँ कॉलेज में ही छूट गया I आज चुपके से जब रोना आता है तो वही लम्हे याद करके दोस्तों का फोन मिला दिया करता हूँ या फिर फेसबुक का दरवाजा खटखटाता हूँ लेकिन सच तो यही है कि वो दिन अब कभी नहीं आयेंगे I  

(Dedicated to all my batch-mates and friends from NIT Agartala )