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बुधवार, मई 16, 2018

ख़ामोशी में बोलते शब्द

मई 16, 2018 0 Comments

बैठा हुआ हूँ मैं समुद्र के किनारे... दूर दूर तक सिर्फ नीला पानी है  एक लहर तेजी से आती है और मेरे पैरों को छूकर.. वापस लौट जाती है। अच्छा लगता है ऐसे.. बैठे हुए बिना किसी फिक्र के। ठंडा खारा पानी जब पैरों को आकर छूता है तो ऐसा लगता है किसी ने गुदगुदा कर हँसाने की कोशिश की है... उसे पता है सब  पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अभी यहाँ दूर दूर तक कोई नहीं.. मन में आता है कि कहीं मैं गलत तो नहीं आ गया फिर आँखे बंद कर लेता हूँ। तेजी से लुढ़कता हुआ पानी फिर आता है और मेरे पैरों को चूम कर वापस लौट जाता है। आँखे हल्की सी गीली हो जाती हैं लेकिन होठों पर मुस्कान है.. मुस्कान है विस्मय की.. मुस्कान है आश्चर्य की।

आँखो में पानी और होठों पर मुस्कान की जगह एक अजीब सी चीखती हुयी खामोशी थी कुछ वक़्त तक। ऊपर आसमान के मिज़ाज के बिगड़ने की आवाज आ रही है.. लगता है शायद बरसात होने वाली है.. घर चलना चाहिए।

मुझे किताबें पसंद हैं...हर तरह की। जवाब छुपे होते हैं उनमें हमारे हर अनकहे सवाल के। खामोशी बस नहीं समझ पाती ये और समझ भी जाती हैं तो कुछ बोल नहीं पाती। कान तरस गए हैं कुछ समझने को... सुनने को... बोलने को... खामोशी लील गयी है सब..

पापा भी खामोश रहते हैं। पहले मैं भी खामोश रहता था उनकी तरह। फिर अचानक से बोलना सीखा जैसे साइकिल चलाना सीखते हैं पहली बार। जब तक लगता है पीछे कोई पकड़े हुए है हम आसानी से चलाये जाते हैं पर मुड़कर देखने पर अगर कोई नहीं होता तो धड़ाम से मुँह के बल गिर पड़ते हैं.. डर लगता है फिर से साइकिल का हैंडल पकड़ने से। खामोशी अच्छी होती है लेकिन कोई लंबी खामोशी चुभती है। ऐसे में कुछ ना कुछ कहते रहना सही होता है इसलिए बड़बड़ाता रहता हूँ पागलों की तरह। किसी से बात करता रहता हूँ शायद...

रात को अब लाइट जलाकर सोने की आदत हो गयी है... वैसे कई आदतें वक़्त के साथ बदल जाती हैं। कॉकरोच से डर वैसा ही है... खैर मेरे नए कमरे में आते नहीं है

रेत पर कुछ बनाया मैंने और पानी फिर सब बहाकर अपने साथ ले गया। क्या बुरा होता है सपने देखना और उसके लिए कोशिशें करना..पता नहीं...

ये लो बरसात होने भी लगी... बरसात में समंदर कितना सुंदर दीखता है... मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मन कर रहा है यहीं बैठे रहने का.. भीग जाने का.. खुशी देती है बरसात। कभी कभी आती है मुझसे मिलने और मेरी सारी शिकायतें दूर कर जाती है.. एक अच्छी प्रेमिका की तरह। मेरे गालों को छूती है.. मेरे होठों को चूमती है...और मेरी बाहों में बिखर जाती है। मैं भी अपना सर रख देता हूँ उसकी गोद में बिना किसी फिक्र के। वो सर के बाल सहलाती रहती है। अच्छा लगता है.. सुकून मिलता है.. सारी थकान दूर हो जाती है। बरसात के ये कुछ पल तो सुकून के होते हैं... शुक्र है