आत्मकथा
हिमाँशु मोहन
फ़रवरी 23, 2020
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24 फरवरी, 2019
12:45 a.m.
बहुत दिनों से
सोच रहा हूँ कि अपने बारे में लिखूँ, अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखूँ, लिखना शुरू ही कर दूं। लेकिन जब शुरू करने बैठता हूँ तो कोई सिरा पकड़ में ही नहीं आता। ऐसे में मुझे अज्ञेय जी की एक बात याद
आ जाती है कि “हर किसी की ज़िन्दगी में इतनी घटनाएँ हो चुकी होती हैं कि उनसे एक
सुन्दर उपन्यास बन सके अगर वास्तव में उन्हें लिखना आता हो तब।” इसके बाद मेरे
सारे भाव शून्य हो जाते हैं। मेरे जीवन में एक नहीं ऐसी हजारों घटनाएँ हैं और मुझे
थोड़ा बहुत लिखना भी आता है। लेकिन फिर भी लिखना कैसे संभव है? वो भी अपने जीवन के
बारे में? मैंने ऐसा किया ही क्या है अब तक? कौन हूँ मैं जो मैं अपने बारे में
लिखने बैठ जाऊं? क्या मैं अपने प्रति उतना ईमानदार रह पाऊंगा? क्या मुझमें इतनी
हिम्मत है कि मैं सच लिख सकूँ? अपना सच, अपने आसपास का सच। क्या अपनी भावनाओं को तठस्त
करके मैं सच से भरे क्षितिज पर अपने जीवन के सूर्य को उगते हुए देख पाऊंगा? मुझे
अपने जिए जा चुके जीवन पर गर्व होना चाहिए या फिर उस पर खेद प्रकट करना चाहिए? प्रेम
का क्या दायित्व होगा मेरे जीवन में? मैं अपना जीवन प्रेम से परिभाषित करूँ या फिर
एकाकीपन से? कौन श्रेयस्कर है मेरे जीवन में? सफलताओं की परिभाषा क्या तय करूँ?
संबंधों का क्या महत्त्व रहा है मेरे जीवन में?
सवाल इतने उठते हैं लेकिन सब मन की
दीवार से टकराते हैं और ख़ामोशी लेकर लौट आते हैं। उस ख़ामोशी में मुझे सिर्फ वो
लम्हें याद आते हैं जिनसे मैंने अपनी पीठ टिकाई हुई है। उन लम्हों की परछाई मेरी परछाई के साथ चलती है। मैं सोता हूँ तो मेरे पैरों के पास सर रखकर सो जाती है।
फिर मुझे लगने लगता है कि नहीं अभी मुझे थोड़ा और इंतजार करना चाहिए। वो सिरा अभी
नहीं मिलेगा जिसे पकड़ कर कुछ लिखना शुरू किया जा सकता हो। क्या पता किसी नए शहर
में, अनजाने चेहरों को देखकर कोई कहानी मन में आ जाए और उस कहानी के अंत से मेरी कहानी
शुरू हो जाए। क्या पता..?



