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शनिवार, फ़रवरी 15, 2020

भ्रम


 

सीलिंग पर लगा पंखा धीमे धीमे घूम रहा है। जिससे आवाज आ रही है। बहुत देर से मैं उसे सुन रहा हूँ। एक ही ध्वनि बार बार रिपीट हो रही है। मुझे इसमे एक संगीत सा लग रहा है जैसे कोई सुन्दर ग़ज़ल चल रही हो। 

"क्या ख़बर होती है उन्हें, होश में रहे जो उम्र भर
होश खोकर ही मिली है, जिंदगी की नज़्म ये.."

पंखे को घूमता देख मेरी आँखे बंद होने लगी। पर मन के कोने में सवाल चलते रहे। उसने मेरी आत्मा को तब कैसे पहचान लिया था? और अब? तभी अचानक गूं गूं की आवाज के साथ फोन झनझना उठा...मेरी नींद टूट गयी। अब बहुत ही कच्ची नींद आती है। नींद की गोलियाँ अब मीठी लगने लगीं हैं। मैंने दो महीनों से फ़ोन को साइलेंट पर किया हुआ है। 

देखा तो महीनों बाद उसका ही मैसेज था। "मुझे अब अकेले रहना है।" मैंने मैसेज को पढ़कर फोन उल्टा करके तकिये के नीचे रख दिया और फिर से घूमते हुए पंखे को देखने लगा। फिर से एक ग़ज़ल मेरे कानों में बजने लगी और मैं एक गहरी नींद में सोता चला गया। फिर लगा जैसे मैं किसी सपने से जाग गया... 

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं सपने में हूँ या फिर सपने से अभी अभी जगा हूँ। मैंने झट से तकिये के नीचे से अपना फोन उठाया। "मैं तुमसे आखिरी बार मिलना चाहता हूँ।" मेरा भेजा हुआ मैसेज अभी भी उधर से पढ़ा नहीं गया था... 


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