बहुत दिनों से अजीब सी घुटन हो रही है मन में। जो सोचा था वो नहीं हो पाया। कभी नहीं होता है। शुरू शुरू में पता नहीं लगता। जैसे चाहा होता है वैसा वैसा हो रहा होता है। हम खुश होते हैं। फिर थोड़ा थोड़ा बदलने लगता है लेकिन ख़ुशी के मारे हमें पता नहीं चलता। कुछ जान नहीं पाते। फिर बहुत कुछ बदल जाता है अचानक से। लेकिन ये अचानक नहीं होता। हमें बस लगता है कि सब कुछ अचानक हो गया। सब बर्बाद हो गया। ये बहुत दिनों से हो रहा होता है।
हर
बार की तरह मैंने एक सिगरेट जला ली। काफी दिनों से इसे छुआ भी नहीं। माँ ने कहा था
कि मत पिया कर। जलती हुयी सिगरेट का धुआं भी अजीब सा होता है। वो चाहता है मुझे
पिया जाना चाहिए था। वो गले से फेफड़ों में उतरना चाहता है। फेफड़ों को बर्बाद कर
देना चाहता है। सिगरेट की डिब्बी पर चेतावनी भी लिखी हुयी है। मैं उसे परे कर एक
कश मुँह में भर लेता हूँ, हर बार, बार-बार। प्यार भी
सिगरेट की तरह होता है।
बहुत
सालों बाद समझ आया कि जिंदगी में मैं ज्यादातर अकेला रहा। जब अकेला था तो किसी के
साथ होना चाहता रहा। जब साथ हो गया फिर भी अकेला ही बना रहा। अब जब अकेला हूँ तब
किसी के साथ हूँ। साथ होना दिखायीं देता है, अकेला होना दिखायी नहीं देता। साथ
होना दिखावा है और अकेला होना सुकून। लेकिन अकेला होकर किसी के साथ होना न ही
दिखावा है और न ही सुकून। ये वैसा ही जैसे पानी का रंग, हवा
की महक, माँ की प्रार्थनाएं। पानी का रंग शून्य होता है,
पर पानी होता है। हवा की महक नहीं होती पर वो मन के भीतर घुसी चली
जाती है। जब लगता है माँ शांत सी बैठी, भजन में लीन हैं तो
वो असल में मेरे लिए प्रार्थनाएं पढ़ रही होती हैं।मैं आज अपने मन की घुटन को बाहर
निकाल देना चाहता था। लेकिन कोई सिरा नहीं मिला। पहले सोचा कि रंजना से ही शुरू कर
दूं। फिर लगा रहने दूं। हर एक वाक्य के बनने में वो है लेकिन उसे मैंने हर वाक्य
से निकाल दिया है। इससे घुटन कुछ कम होती रही। क्या होती रही?

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