Follow Us @himanshujaiswal2711

शुक्रवार, अक्टूबर 06, 2017

रूह से रूह तक ( विनीत बंसल ) – समीक्षा



कहानियाँ कई तरह की होती हैं लेकिन आज के समय में जो युवाओं के द्वारा सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं वो है या तो प्रेम या फिर कॉलेज लाइफ पर आधारित कोई कहानी I रूह से रूह तक उपन्यास की कहानी भी इससे कुछ जुदा नहीं है I इसी लीक पर लिखी गयी एक सस्पेंस से भरी कहानी है I उपन्यास का नाम उसकी कहानी को तो नहीं पर कहानी में दर्शाए गए प्रेम को पूरी तरह से व्यक्त करता है I लेखक के शब्दों में कहूँ तो – “प्यार वो जज्बा है जो दिल को दिल से नहीं बल्कि रूह को रूह से जोड़ता है I”

हिंदी साहित्य की दृष्टि से उपन्यास में झाँकने के लिए कुछ खास है नहीं लेकिन जिन्हें कोई जासूसी उपन्यास या फिर कॉलेज रोमांस पर कुछ अच्छा पढ़ने का मन हो तो वो इस किताब को आंख बंद कर खरीद सकते हैं I अंग्रेजी उपन्यास पढने वाले युवा अगर कोई हिंदी उपन्यास पढने का सोंच रहे हैं तो वे किसी हिंदी रूपांतरण के बजाय अगर “रूह से रूह तक” को पढ़ेंगे तो उन्हें इसमें वही रोमांस, रोमांच, सस्पेंस और मसाला मिल जायेगा जो वो अक्सर अंग्रेजी के उपन्यासों में देखते हैं I

नील गुप्ता जिसका जयपुर यूनिवर्सिटी में पहला दिन है रणदीप को दूसरे गैंग के लड़कों से बचाता है I लेकिन ना किसी गैंग को अच्छे से दिखाया गया है और ना ही मारपीट का कोई कारण समझ में आता है I इसे कहानी की सबसे कमजोर कड़ी ही कहूँगा I फिर वही किसी फिल्म की कहानी की तरह कहानी आगे बढती है I नील और रणदीप में बड़ी गहरी दोस्ती हो जाती है, सगे भाई से भी बढकर और धीरे धीरे रणदीप के साथ से उसे यूनिवर्सिटी में सभी जानने लगते है I

कहानी जयपुर यूनिवर्सिटी से शुरू होती है..हालाँकि ये किसी यूनिवर्सिटी की फील दे नहीं पाती I कहानी में राजनीति को दिखाने का असफल प्रयास किया गया है जहाँ दबंगई तो है लेकिन दबंगई करने वालों के दिल अच्छे हैं I इससे लेखक के साफ दिल का पता चलता है I कहानी का दबंग रणदीप शुरू शुरू में मिलनसार, एक अच्छा दोस्त और भाई दिखाया जाता है जो आखिर तक आते आते नील गुप्ता का जानी दुश्मन बन जाता है I यह कैसे और किन हालातों में होता है कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा यही है I

इसी बीच एक खूबसूरत लड़की अदिति जिसकी कॉलेज में लेट एंट्री हुई है वो नील की पहली नजर की मोहब्बत बन जाती है I वहीँ रिया भी लेट एंट्री में एडमिशन लेती है I यू.एस. से आने के बाद वो जयपुर यूनिवर्सिटी में एडमिशन क्यों ले लेती है ये बात समझ से परे है लेकिन वो एक फैशन शो से पूरे कॉलेज की स्टार बन जाती है I ये वाकया ऐसा लगता है जैसे हम खुद उस कॉलेज में बैठे उस शो का हिस्सा हों जिसे लेखक ने बखूबी पेश किया है I

नील-अदिति के प्यार को, उनके रिश्ते को जिस बारीकी से विनीत जी ने दिखाया है वो काबिले तारीफ है I वे सही मायनों में कहानी के आगे बढ़ने के साथ साथ सच्चे प्यार की नींव रखते चलते हैं जिसमें सपने हैं, वादे हैं, रूमानियत है, विश्वास है और समर्पण भी शारीरिक और मानसिक दोनों I बीच बीच में लगता है कि कहानी का कोई उद्देश्य नहीं लेकिन जैसे ही रिया के इश्क के रूप में रणदीप को जो बुखार चढ़ता है उससे कहानी की दिशा पूरी तरह से बदल जाती है I रिया रणदीप के प्यार को ठुकरा देती है और रणदीप की हालत एक देवदास की तरह हो जाती है I नील से उसकी ये हालत देखी नहीं जाती इसी बीच कुछ ऐसा होता है कि रिया हॉस्टल की छत से कूदकर आत्महत्या कर लेती है और उसका इलज़ाम नील पर लगा जाती है I इसी बदली हुयी हवा से नील की जिंदगी एक रिवर्स गियर पर चली जाती है जो उसके साथ-साथ अदिति की जिंदगी भी बदल कर रख देती है I वास्तव में कहानी का जासूसी टाइप अध्याय यही से शुरू होता है जो पूरी तरह सस्पेंस से भरा हुआ है I पढ़ते समय आगे क्या होगा...? अब क्या होगा ? जैसे सवालों से पाठक किताब से चिपके रहने को मजबूर हो जाता है I

लेखन शैली में कुछ खास नया देखने को नहीं मिलता I वही पुरानी सुन्दरता की उपमाएं...वैसा ही कॉलेज रोमांस जिसे पढ़कर पाठक फिर से आनंद के कुछ पल महसूस कर सकता है I कहानी का फ़िल्मी होना पाठक को बेहद पसंद आ सकता है I एकतरफ़ा और सिर्फ बाहरी खूबसूरती को देखकर प्यार हो जाना असल प्यार नहीं होता, ये बताना उपन्यास का मुख्य उद्देश्य है I प्यार एक रूह से रूह का संगम है I जो तब भी साथ रहता है जब पूरी दुनिया भी खिलाफ हो जाती है I किसी के दिल में झांके बिना सिर्फ उसकी खूबसूरती देखकर उसके प्यार की बानगी पढ़ना खतरनाक हो सकता है तो वही सच्चा प्यार इतना ओछा नहीं होता कि ठुकराए जाने पर व्यक्ति का चरित्र निम्न स्तर पर खिसक जाये I विनीत बंसल का यह उपन्यास इन्ही प्रतिमानों को स्थापित करता चलता है I

तो वास्तव में “रूह से रूह तक” में सभी के लिए कुछ न कुछ है I ये किताब निराश नहीं करती I अगर आप लेखक की छोटी मोती तकनीकी गलतियों को नज़रंदाज़ कर सकते हैं तो वास्तव में इस किताब में पढ़ने के लिए बहुत कुछ है I अच्छी और सरल भाषा शैली जो कि बिलकुल साधारण होकर कहानी को एक ऊंचाई प्रदान करती है I अंत में कहानी पाठक को चौंका सकती है और यही इसकी खासियत भी है I कभी कभी लेखक केवल मनोरंजन की दृष्टि से लिखता है और ऐसे में बहुत कुछ सिखा जाता है I ये किताब भी इसी उद्देश्य को पूरा करती हुई प्रतीत होती है I

(विचार व्यक्तिगत हैं...)

-    हिमाँशु मोहन 


2 टिप्‍पणियां:

आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है...