To all my batchmates,
जब कॉलेज में था तो कभी इतना सा खयाल नहीं आया कि जी भर के इन दिनों को जी ले फिर कभी ये दिन वापस नहीं मिलेंगे I सुना तो था अपने सीनियरर्स से कि बेटा...कॉलेज से जाने के बाद बहोत याद करोगे इसलिए जी लो जितना जीना है, फिर कभी ये दिन नहीं आयेंगे I आज जब कॉलेज से कोसों दूर हैं...वहाँ मिलने वाले अलग अलग राज्यों के दोस्तों से कोसों दूर हैं तब सच कहूँ तो उन दिनों को फिर से याद करके दिल रो पड़ता है I वैसे मस्ती तो बहोत की है हम सबने I एक तो हमारी ब्रांच सबसे नयी थी I हमारा पहला बैच था और ऊपर चौदह विद्यार्थियों के ग्रुप में सिर्फ एक लड़की I पूरे कॉलेज की लड़कियों को देखते थे और फिर भौतिकी के गूढ़ सिद्धांतों में खुद को खोकर हर दिन सत्यनारायण की कथा पढ़ कर मन को एकाग्र कर लेते थे I फिर ग्रुप में बैठकर हमने पूरे कॉलेज प्रशासन को इतना कोसा है जितना तो विपक्ष के नेता रूलिंग पार्टी को भी नहीं कोसते I हर क्लास के लेक्चर के बाद माथा पकड़ के बैठना तो रोज का नियम था – “साले को कछु पढाना नहीं आता...जिंदगी में कछु कर नाहीं पाए तो बन गए भौतिकी के प्रोफेसर... और अगर मेरिट में टॉप भी कर लिए और बन गए प्रोफेसर तो कौन सा तीर मार दिए बे... पढ़ाना तो सीख लेते... तो आज हम जैसे नौज़वानों का पढाई और इंजीनियरिंग पर से विश्वास तो ना उठता I”
कहने को तो हम प्रायोगिक
भौतिकी अर्थात एप्लाइड/एक्सपेरिमेंटल फिजिक्स में इंजीनियरिंग कर रहे थे पर ये सच
तो हमारी अंतरात्मा ही जानती है कि इंजीनियरिंग प्रायोगिक भौतिकी में की या फिर
प्रायोगिक डिप्रेशन में I हर दम यही सोंचते थे कि इस नए कोर्स में हमारा
भविष्य क्या होगा I शुरू के दो साल तो इसी में निकाल दिए और
फिर जब तीसरे साल में आये तब सबको धीरे धीरे अपने ड्रीम्स समझ में आने लगे I
कोई यहाँ से निकलने के बाद M.B.A करना चाहता
था तो कोई फिजिक्स के बाद मैथमेटिक्स पढने की चाह रखता था...किसी को हवाई जहाज
बनाने में दिलचस्पी थी तो किसी को सुदूर विदेश में आगे पढ़ना था और रिसर्च करनी थी I
हम में से कुछ नौकरी करने वाले भी थे जिन्हें अपनी जिम्मेदारियों का
बोझ उठाने के लिए नौकरी करना एक पेशे से ज्यादा एक जरूरत था I सपने तो उनके पास भी थे लेकिन उनके शायद शब्द नहीं थे I हम दोस्त थे तो जान लेते थे एक दूसरे के मन की बात और जानते भी क्यों ना
अक्ल की घंटी सब चेता देती है कि करना क्या था और कर क्या रहे थे I
सबसे ज्यादा यही बात तो
याद आती है कि कैसे हम बेख़ौफ़ अपने मन की सारी बातें एक दूसरे से बेझिझक कह लिया
करते थे I जब भी अपने कमरे में मन नहीं लगता था पहुँच जाते थे दूसरों के कमरे में I
फिर कोई और हमें साथ में बैठे देखता था तो फिर वो भी आ बैठता था I
ऐसे धीरे धीरे हम सब किसी डिस्कशन और हंसी के गुलदस्तों के बीच पूरी
पूरी रात गुज़र देते थे और एक रात यूँही गुज़र जाती थी बिना ये जताए कि हमने क्या
पाया है I आज यही तो जता रही हैं ये राते कि हमने क्या क्या
पाया था उन रातों में I सच में बहुत याद आते हैं वो पल,
वो साथ, वो रात, वो
सितारे और वो मस्त होकर अंधेरों में घूमना, एक दूसरे से लड़ना
झगड़ना I बेमतलब की खिंचाई, नाराज़गी और
भी बहुत कुछ I जब कभी परेशानियों में अकेले में रोना आता था
तब कंधे मिल जाते थे I जब जेब कभी तंग हो जाती थी तो हाथ बढ़
जाते थे I जब लगता था कि पूरी दुनिया में हमारे लिए कोई नहीं
है तो सब साथ हो लेते थे I तब खाना खाना कभी एक बोझ और
अकेलापन नहीं लाता था I तब वो एक बहाना हुआ करता था थोड़ी और
मस्ती करने का I आज चुप से बैठकर वही खाना खा तो लेता हूँ पर
जैसे लगता है स्वाद तो वहीँ कॉलेज में ही छूट गया I आज चुपके
से जब रोना आता है तो वही लम्हे याद करके दोस्तों का फोन मिला दिया करता हूँ या
फिर फेसबुक का दरवाजा खटखटाता हूँ लेकिन सच तो यही है कि वो दिन अब कभी नहीं
आयेंगे I
(Dedicated to all my
batch-mates and friends from NIT Agartala )

�� I was lost in it for a moment visualising your words. Awesome!
जवाब देंहटाएंThat's a successful description then.. I guess.. Thank you.. :)
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